सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

अब तो जागिए 08

आ रहा है -
धुंध का सैलाब।
अब तो जागिए

आज घर की लाज चहुँदिश
कीचकों से त्रस्त है।
रहनुमाई राग-रंग की
वीथियों में मस्त है

हर सुरक्षा
लग रही है ख्वाब
अब तो जागिए

हर कदम पर खौफ़
पैराशूट से उतरा यहाँ
आस्तीनों में छुपे
गद्दार से ख़तरा यहाँ

दाँव पर
लगती वतन की आब
अब तो जागिए

मुस्कुराती गंध
नफ़रत की हवा में खो गई
आस्था भी गोधरा-सी
रक्तरंजित हो गई

रैलियों में
बँट रहा तेज़ाब
अब तो जागिए

-- हरिशंकर सक्सेना

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