रविवार, 23 अक्तूबर 2011

कान में कहकर गया-डा० जगदीश व्योम 09

उड़ गया मधुपान कर
कोई मधुप
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई
सुर्ख चेहरे हो गए
जलकुंभियों के
कान में कहकर गया
कुछ बात कोई

डाकियों के का़फिले
फिर चल पड़े हैं
गंध-भीनी चिट्ठियाँ
लेकर परों में
गाँव के रिश्ते
सरोवर से जुड़े हैं
लग गई फिर पहुँचने
पुरइन घरों में
हो गया ऐसा असर
फिर जादुई है
कुछ दिनों से
सो न पाई रात कोई
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई

बढ़ गई चिन्ता
सरोवर में बढ़ा जल
गात पुरइन ने बढ़ाया
जल सतह तक
घट गया जल
पर न घट सकता कमल-कद
अन्त तक जूझा हवा से
फिर फतह तक
है हमारे संस्कारों का पुरोधा
या सुरभि के सिन्धु का
नवजात कोई
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई

डा० जगदीश व्योम

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