रविवार, 23 अक्तूबर 2011

तू खुलकर सच बोल 11

इस झूठी
नीरस दुनिया में
कुछ सच का रस घोल
मन रे
तू खुलकर सच बोल

तू हारा
मानव हारा है
तू जीता तो यह जीता है
तेरे दम से
जीवन का हर
विष अमृत करके पीता है
तू चाहे
इतिहास बदल दे
तू चाहे भूगोल

मन में हो
यदि महक सत्य की
तन भी खिला-खिला रहता है
जीवन के
हर रंग-ढंग में
खुलकर घुला-मिला रहता है
ऐसी मीठी
महक दसों दिसि
के समीर में घोल
--
डॉ. त्रिमोहन तरल

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें