सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

फूल ये पलाश के 16

लाए हैं पुन: दिवस आस के, विश्वास के
फूल ये पलाश के

सज गया धरा का धरातल विशेष तौर पर
अलि-पिक के मधुर स्वर आज आम्रबौर पर
लताएँ सब लिपट गई हैं,
सन्निकट स्वगाछ से

पीतपत्र झड. गए, छा गए नवल-नवल
स्वच्छ जल के दर्पणों में,रूप देखते कमल
कुमुदिनी के रात-दिन,
हो गए सुहास के

पर्णहीन सेमलों में फूल-फूल रह गए
फूल भी तो शीघ्र ही एक-एक झड़ गए
पल्लवित-फलित हुए,
देख दिन विनाश के

दिक्-दिगन्त में छटा है छा गई वसन्त की
बांधती स्वपाश में हैं,टोलियाँ अनंग की
देखो,दिन ये चार ही हैं,
मधुर मधुरमास के

-राममूर्ति सिंह 'अधीर'

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