मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

पलक झपकते ही 18

पलक झपकते ही सबके सब
मेरे काम किये
उसने सौ माँगे तो मैंनें
दो सौ उसे दिये|

देकर काम कराने की
ये रीत पुरानी है
सदियों से ही जन जन की
जानी पहचानी है
बड़े बुजुर्गों ने ये बातें
बारंबार कहीं
पैसे देकर काम कराना
अब तो कठिन नहीं
हम तो लेकर देकर ही
जीवन समृद्ध जिये|

घर घर में अब होड़ लगी है
दौड़ लगाने की
जैसे भी हो किसी तरह से
सब कुछ पाने की
इसी चाह ने रिश्तों मित्रों
से नाता तोड़ा
झूठ दिखावे से निर्मित
छल का मुखड़ा ओढ़ा
किसी तरह भी उल्लासित हो
आनंदित रहिये|

पैसा रहा हाथ में तो
फिर हर दिन उत्सव है
ऊँची पदवी कुर्सी है तो
रोज महोत्सव है
जिस दिन "डैडी" ढेर ढेर
रुपये घर लाते हैं
उस दिन बीवी बच्चों के
चेहरे खिल जाते हैं
जल जाते बिन दीवाली के
ढेरों ढेर दिये|

झोपड़ियों में जिस दिन भी
चूल्हा जल जाता है
मानो उस दिन बहुत बड़ा
उत्सव हो जाता है
देख तवे पर रोटी
बच्चे खुश हो जाते हैं
बड़े जोर से भारत माँ की
जय चिल्लाते हैं
आज आप भी भारत माता की
जय जय कहिये

-प्रभु दयाल
(छिंदवाड़ा)

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