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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

चितवन फूल पलाश 16

हँसी तुम्हारी चंदा जैसी,
चितवन फूल पलाश
बातें झरना यथा ओसकण
तारों भरा उजास

गुन-गुन
भौंरों जैसे गाना,
और शरारत से मुस्काना
हौले-से,
ही हमें चिढ़ाना
वादा कर फिर हाथ न आना
चमकाती लेकिन फिर भी हो
एक किरन की आस


जो भी
दिन है साथ बिताए,
जस फूलों की घाटी घर
नोंक-झोंक
विस्मृति-स्मृति में,
एक क्षीरमय सुन्दर सर
मिलना तुम से तीरथ जैसा,
भूला - बिसरा रास

- क्षेत्रपाल शर्मा

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

इतना मत तरसा 10

इतना मत तरसा
यार, कुछ बूंदें तो बरसा

इतनी गरमी हाय पसीना
दिन बदरंग हो गया कारी
टेर रहा है मोर और
लगी सूखने है फुलवारी
कुछ भीगेंगे कुछ नाचेंगे
कहरवा, कजरी को हरसा

दृष्टि जहाँ तक सृष्टि हँसेगी
डाल-डाल पर झूले
दिन की बारहमासी
रातोंरात मल्हारें छूले
मत टँग आसमान में मैले
झर तू झर-झर-सा

धूल बनोगे या एक मोती
या वारिधि का संग
सब कुछ भला-भला-सा होगा
आओ, जैसे गंग
घर से निकले हो तो
मन में ऐसा क्यों डर-सा
--
क्षेत्रपाल शर्मा
(नई दिल्ली)