डूबा था इकतारा
मन में
जाने कब से
चाह रहा था
खुलना-खिलना
अपने रब से
दी झनकार सुनाई
खुलीं खिड़कियाँ
दरवाज़े
जागे परकोटे
चिड़ियाँ छोटीं
तोते मोटे
मिलकर लोटे
नया सवेरा लाई
महकीं गलियाँ
चहकीं सड़कें
गाजे-बाजे
लोग घरों से
आए बाहर
बनकर राजे
गूँजी फिर शहनाई
--अवनीश सिंह चौहान
(मुरादाबाद)
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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011
सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
क्या कहे सुलेखा 15
किससे अब
क्या कहे सुलेखा !
खनन माफ़िया
मिलकर लूटें
जल औ' जंगल
नित-नित टूटें
मेट रहे
कुदरत का लेखा !
बोली 'छविया'
धरा-दबोचा
नेता-मालिक
सबने नोंचा
समाचार
यह सबने देखा !
दुस्साहस-
क्रशरों का बढ़ता
चट्टानों से
चूना झड़ता
टूट रही
है जीवन रेखा !
अवनीश सिंह चौहान
(मुरादाबाद)
क्या कहे सुलेखा !
खनन माफ़िया
मिलकर लूटें
जल औ' जंगल
नित-नित टूटें
मेट रहे
कुदरत का लेखा !
बोली 'छविया'
धरा-दबोचा
नेता-मालिक
सबने नोंचा
समाचार
यह सबने देखा !
दुस्साहस-
क्रशरों का बढ़ता
चट्टानों से
चूना झड़ता
टूट रही
है जीवन रेखा !
अवनीश सिंह चौहान
(मुरादाबाद)
किससे अब क्या कहे सुलेखा ! 15
खनन माफ़िया
मिलकर लूटें
जल औ' जंगल
नित-नित टूटें
मेट रहे
कुदरत का लेखा !
बोली 'छविया'
धरा-दबोचा
नेता-मालिक
सबने नोंचा
समाचार
यह सबने देखा !
दुस्साहस-
क्रशरों का बढ़ता
चट्टानों से
चूना झड़ता
टूट रही
है जीवन रेखा !
अवनीश सिंह चौहान
(मुरादाबाद)
मिलकर लूटें
जल औ' जंगल
नित-नित टूटें
मेट रहे
कुदरत का लेखा !
बोली 'छविया'
धरा-दबोचा
नेता-मालिक
सबने नोंचा
समाचार
यह सबने देखा !
दुस्साहस-
क्रशरों का बढ़ता
चट्टानों से
चूना झड़ता
टूट रही
है जीवन रेखा !
अवनीश सिंह चौहान
(मुरादाबाद)
होली में 14
लाल-गुलाबी बजीं तालियाँ
बरसाने की होली में
बजे नगाड़े ढम-ढम-ढम-ढम
चूड़ी खन-खन, पायल छम-छम
सिर-टोपी पर भँजीं लाठियाँ
ठुमके ग्वाले तक-धिन-तक-धिन
बृजवासिन की सुनें गालियाँ
बृज की मीठी बोली में
मिलें-मिलायें गोरे-काले
मौज उड़ायें देखन वाले
तस्वीरों में जड़ते जायें
मन लहरायें-फगुनायें दिन
प्रेम बहा सब तोड़ जालियाँ
दिलवालों की टोली में
चटक हुआ रंग फुलवारी का
फसलों की हरियल साड़ी का
पक जाने पर भइया, दाने
घर आयेंगे खेतों से बिन
गदरायीं हैं अभी बालियाँ
बैठीं अपनी डोली में
- अवनीश सिंह चौहान
बरसाने की होली में
बजे नगाड़े ढम-ढम-ढम-ढम
चूड़ी खन-खन, पायल छम-छम
सिर-टोपी पर भँजीं लाठियाँ
ठुमके ग्वाले तक-धिन-तक-धिन
बृजवासिन की सुनें गालियाँ
बृज की मीठी बोली में
मिलें-मिलायें गोरे-काले
मौज उड़ायें देखन वाले
तस्वीरों में जड़ते जायें
मन लहरायें-फगुनायें दिन
प्रेम बहा सब तोड़ जालियाँ
दिलवालों की टोली में
चटक हुआ रंग फुलवारी का
फसलों की हरियल साड़ी का
पक जाने पर भइया, दाने
घर आयेंगे खेतों से बिन
गदरायीं हैं अभी बालियाँ
बैठीं अपनी डोली में
- अवनीश सिंह चौहान
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