समाचार है अच्छा मौसम
आने वाला है
भीमसेन सा
पंचम सुर में
गाने वाला है
इन्द्रधनुष की
प्रत्यंचा फिर
गगन कस रहा
हरे भरे
जंगल में आकर
हिरन बस रहा
कोई
फूलों में आकर
बतियाने वाला है
प्यासे खेत
पठार
लोकरंगों में डूबे
रेत हुई
नदियों के
रूमानी मंसूबे
कोई देकर
अपना हाथ
छुड़ानेवाला है
साँस -साँस में
गंध गुलाबी
हवा बह रही
तोड़ रहीं
छत इच्छाएं
दीवार ढह रही
भटकन में
भी कोई
राह बतानेवाला है
मन केरल की
मृगनयनी
आँखों में खोया
थका हुआ
चेहरा सागर
लहरों ने धोया
कोई काट
चिकोटी हमें
सताने वाला है
-जयकृष्ण राय तुषार
(इलाहाबाद)
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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
समाचार है अच्छा मौसम 15
17
शहर के
एकांत में
हमको सभी छलते
ढूँढने पर
भी यहाँ
परिचित नहीं मिलते
बाँसुरी के
स्वर कहीं
वन- प्रान्त में खोए
माँ तुम्हीं को
याद कर हम
देर तक रोए
धूप में
हम बर्फ़ के
मानिन्द हैं गलते
रेलगाड़ी
शोरगुल
सिगरेट के धूँए
प्यास अपनी
ओढ़कर
बैठे सभी कूँए
यहाँ
टहनी पर कँटीले
फूल हैं खिलते
गाँव से लेकर चले जो
गुम हुए सपने
गाँठ में
दम हो तभी
ये शहर हैं अपने
यहाँ
साँचे में सभी
बाज़ार के ढलते
भीड़ में
यह शहर
पाकेटमार जैसा है
यहाँ पर
मेहमान
सिर के भार जैसा है
भीड़ में
तनहा हमेशा
हम सभी चलते
-जयकृष्ण राय तुषार
(इलाहाबाद)
एकांत में
हमको सभी छलते
ढूँढने पर
भी यहाँ
परिचित नहीं मिलते
बाँसुरी के
स्वर कहीं
वन- प्रान्त में खोए
माँ तुम्हीं को
याद कर हम
देर तक रोए
धूप में
हम बर्फ़ के
मानिन्द हैं गलते
रेलगाड़ी
शोरगुल
सिगरेट के धूँए
प्यास अपनी
ओढ़कर
बैठे सभी कूँए
यहाँ
टहनी पर कँटीले
फूल हैं खिलते
गाँव से लेकर चले जो
गुम हुए सपने
गाँठ में
दम हो तभी
ये शहर हैं अपने
यहाँ
साँचे में सभी
बाज़ार के ढलते
भीड़ में
यह शहर
पाकेटमार जैसा है
यहाँ पर
मेहमान
सिर के भार जैसा है
भीड़ में
तनहा हमेशा
हम सभी चलते
-जयकृष्ण राय तुषार
(इलाहाबाद)
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समाचार है अच्छा मौसम
आने वाला है
भीमसेन सा
पंचम सुर में
गाने वाला है
इन्द्रधनुष की
प्रत्यंचा फिर
गगन कस रहा
हरे भरे
जंगल में आकर
हिरन बस रहा
कोई
फूलों में आकर
बतियाने वाला है
प्यासे खेत
पठार
लोकरंगों में डूबे
रेत हुई
नदियों के
रूमानी मंसूबे
कोई देकर
अपना हाथ
छुड़ानेवाला है
साँस -साँस में
गंध गुलाबी
हवा बह रही
तोड़ रहीं
छत इच्छाएं
दीवार ढह रही
भटकन में
भी कोई
राह बतानेवाला है
मन केरल की
मृगनयनी
आँखों में खोया
थका हुआ
चेहरा सागर
लहरों ने धोया
कोई काट
चिकोटी हमें
सताने वाला है
-जयकृष्ण राय तुषार
(इलाहाबाद)
आने वाला है
भीमसेन सा
पंचम सुर में
गाने वाला है
इन्द्रधनुष की
प्रत्यंचा फिर
गगन कस रहा
हरे भरे
जंगल में आकर
हिरन बस रहा
कोई
फूलों में आकर
बतियाने वाला है
प्यासे खेत
पठार
लोकरंगों में डूबे
रेत हुई
नदियों के
रूमानी मंसूबे
कोई देकर
अपना हाथ
छुड़ानेवाला है
साँस -साँस में
गंध गुलाबी
हवा बह रही
तोड़ रहीं
छत इच्छाएं
दीवार ढह रही
भटकन में
भी कोई
राह बतानेवाला है
मन केरल की
मृगनयनी
आँखों में खोया
थका हुआ
चेहरा सागर
लहरों ने धोया
कोई काट
चिकोटी हमें
सताने वाला है
-जयकृष्ण राय तुषार
(इलाहाबाद)
गाल गुलाबी हुए धूप के 14
इस मौसम में
आज दिखा है
पहला-पहला बौर आम का।
गाल गुलाबी
हुए धूप के
इन्द्रधनुष सा रंग शाम का।
साँस-साँस में
महक इतर सी
रंग-बिरंगे फूल खिल रहे,
हल्दी अक्षत के
दिन लौटे
पंडित से यजमान मिल रहे,
हर सीता के
मन दर्पण में
चित्र उभरने लगा राम का।
खुले-खुले
पंखों में पंछी
लौट रहे हैं आसमान से
जगे सुबह
रस्ते चौरस्ते
मंदिर की घंटी अजान से।
बर्फ पिघलने
लगी धूप से
लौट रहा फिर दिन हमाम का।
खुली-बन्द
ऑंखों में आते
सतरंगी सपने अबीर के।
द्वार-द्वार गा रहा
जोगिया मौसम
पद फगुआ कबीर के
रूक-रूक कर चल रहा बटोही
इंतजार है किस मुकाम का
--जयकृष्ण राय तुषार
आज दिखा है
पहला-पहला बौर आम का।
गाल गुलाबी
हुए धूप के
इन्द्रधनुष सा रंग शाम का।
साँस-साँस में
महक इतर सी
रंग-बिरंगे फूल खिल रहे,
हल्दी अक्षत के
दिन लौटे
पंडित से यजमान मिल रहे,
हर सीता के
मन दर्पण में
चित्र उभरने लगा राम का।
खुले-खुले
पंखों में पंछी
लौट रहे हैं आसमान से
जगे सुबह
रस्ते चौरस्ते
मंदिर की घंटी अजान से।
बर्फ पिघलने
लगी धूप से
लौट रहा फिर दिन हमाम का।
खुली-बन्द
ऑंखों में आते
सतरंगी सपने अबीर के।
द्वार-द्वार गा रहा
जोगिया मौसम
पद फगुआ कबीर के
रूक-रूक कर चल रहा बटोही
इंतजार है किस मुकाम का
--जयकृष्ण राय तुषार
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