आषाढ़ से आकाश अब तक रो रहा है
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है
आज पानी बन गया जंजाल है
भूख से पंछी हुए बेहाल हैं
रश्मियों को सूर्य अपनी खो रहा है
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है
कब तलक नौका चलाएँ मेह में
भर गया पानी गली और गेह में
इन्द्र जल-कल खोल बेसुध सो रहा है
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है
बिन चुगे दाना गगन में उड़ चले
घोंसलों की ओर पंछी मुड़ चले
दिन-दुपहरी दिवस तम को ढो रहा है
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308
फोनः05943-250207, 09368499921, 09997996437
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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
तार-तार हो गई 08
जिन्दगी ही जिन्दगी पे आज भार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
हादसे सबल हुए हैं
गाँव-गली-राह में,
खून से सनी हुई
छुरी छिपी है बाँह में,
मौत जिन्दगी की रेल में सवार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
चीत्कार, काँव-काँव,
छल रहे हैं धूप छाँव,
आदमी के ठाँव-ठाँव,
चल रहे हैं पेंच-दाँव,
सभ्यता के हाथ सभ्यता शिकार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
--
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
खटीमा, उत्तराखण्ड (भारत)
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
हादसे सबल हुए हैं
गाँव-गली-राह में,
खून से सनी हुई
छुरी छिपी है बाँह में,
मौत जिन्दगी की रेल में सवार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
चीत्कार, काँव-काँव,
छल रहे हैं धूप छाँव,
आदमी के ठाँव-ठाँव,
चल रहे हैं पेंच-दाँव,
सभ्यता के हाथ सभ्यता शिकार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो तार-तार हो गई!!
--
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
खटीमा, उत्तराखण्ड (भारत)
अपनों की रखवाली 12
अपनों की
रखवाली करते-करते उम्र तमाम हुई
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई
मन के
सुमन चहकने में है,
अभी बहुत है देर पड़ी
गुलशन
महकाने को कलियाँ
कोसों-मीलों दूर खड़ीं
पवन-बसन्ती
दरवाजों में
आने में नाकाम हुई
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई
चाल-ढाल
है वही पुरानी,
हम तो उसी हाल में हैं,
जैसे गये
साल में थे
वैसे ही नये साल में हैं
गुमनामी
के अंधियारों में
खुशहाली परवान हुई
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई
-- डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
रखवाली करते-करते उम्र तमाम हुई
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई
मन के
सुमन चहकने में है,
अभी बहुत है देर पड़ी
गुलशन
महकाने को कलियाँ
कोसों-मीलों दूर खड़ीं
पवन-बसन्ती
दरवाजों में
आने में नाकाम हुई
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई
चाल-ढाल
है वही पुरानी,
हम तो उसी हाल में हैं,
जैसे गये
साल में थे
वैसे ही नये साल में हैं
गुमनामी
के अंधियारों में
खुशहाली परवान हुई
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई
और शाम हई
-- डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
रविवार, 23 अक्टूबर 2011
मन में फिर आनंद समाया 11
तुम आए तो जीवन आया
मन में फिर आनंद समाया
गीत रचाया हमने पूरा
लेकिन लगता हमें अधूरा
तुम आए तो सावन आया
शब्दों में फिर बंद समाया
मन में फिर आनंद समाया
मन की क्यारी महक रही थी
साँस हमारी चहक रही थी
आकर तुमने गले लगाया
सुंदर सुर में छंद सुनाया
मन में फिर आनंद समाया
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक
टनकपुर रोड, खटीमा
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - २६२३०८
मन में फिर आनंद समाया
गीत रचाया हमने पूरा
लेकिन लगता हमें अधूरा
तुम आए तो सावन आया
शब्दों में फिर बंद समाया
मन में फिर आनंद समाया
मन की क्यारी महक रही थी
साँस हमारी चहक रही थी
आकर तुमने गले लगाया
सुंदर सुर में छंद सुनाया
मन में फिर आनंद समाया
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक
टनकपुर रोड, खटीमा
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - २६२३०८
मन में आग लगाए रे : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" 10
चौमासे में आसमान में
घिर-घिर बादल आए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
उनके लिए सुखद चौमासा
पास बसे जिनके प्रियतम
कुण्ठित हैं उनकी अभिलाषा
दूर बसे जिनके साजन
वैरिन बदली खारे जल को
नयनों से बरसाए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
पुरवा की जब पड़ीं फुहारें
ताप धरा का बहुत बढ़ा
मस्त हवाओं के आने से
मन का पारा बहुत चढ़ा
नील-गगन के इन्द्रधनुष भी
मन को नहीं सुहाए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
जिनके घर पक्के-पक्के हैं
बारिश उनका ताप हरे
जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं
उनके आँगन पंक भरे
कंगाली में आटा गीला
हर-पल भूख सताए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308
घिर-घिर बादल आए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
उनके लिए सुखद चौमासा
पास बसे जिनके प्रियतम
कुण्ठित हैं उनकी अभिलाषा
दूर बसे जिनके साजन
वैरिन बदली खारे जल को
नयनों से बरसाए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
पुरवा की जब पड़ीं फुहारें
ताप धरा का बहुत बढ़ा
मस्त हवाओं के आने से
मन का पारा बहुत चढ़ा
नील-गगन के इन्द्रधनुष भी
मन को नहीं सुहाए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
जिनके घर पक्के-पक्के हैं
बारिश उनका ताप हरे
जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं
उनके आँगन पंक भरे
कंगाली में आटा गीला
हर-पल भूख सताए रे
श्याम-घटाएँ विरहनिया के
मन में आग लगाए रे
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल 10
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
श्वेत-श्याम से
नजर आ रहे मेघों के दल
कही छाँव है कहीं घूप है
इन्द्रधनुष कितना अनूप है
मनभावन रंग-
रूप बदलता जाता पल-पल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
मम्मी भीगी, मुन्नी भीगी
दीदी जी की चुन्नी भीगी
मोटी बून्दें
बरसाती निर्मल-पावन जल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
हरी-हरी उग गई घास है
धरती की बुझ गई प्यास है
नदियाँ-नाले
नाद सुनाते जाते कल-कल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
बिजली नभ में चमक रही है
अपनी धुन में दमक रही है
वर्षा ऋतु में
कृषक चलाते खेतो में हल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
श्वेत-श्याम से
नजर आ रहे मेघों के दल
कही छाँव है कहीं घूप है
इन्द्रधनुष कितना अनूप है
मनभावन रंग-
रूप बदलता जाता पल-पल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
मम्मी भीगी, मुन्नी भीगी
दीदी जी की चुन्नी भीगी
मोटी बून्दें
बरसाती निर्मल-पावन जल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
हरी-हरी उग गई घास है
धरती की बुझ गई प्यास है
नदियाँ-नाले
नाद सुनाते जाते कल-कल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
बिजली नभ में चमक रही है
अपनी धुन में दमक रही है
वर्षा ऋतु में
कृषक चलाते खेतो में हल
आसमान में
उमड़-घुमड़ कर छाये बादल
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.
पंक में खिला कमल : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" 09
पंक में खिला कमल
किन्तु है अमल-धवल
बादलों की ओट में से
चाँद झाँकता नवल
डण्ठलों के साथ-साथ
तैरते हैं पात-पात
रश्मियाँ सँवारतीं
प्रसून का सुवर्ण-गात
देखकर अनूप-रूप को
गया हृदय मचल
बादलों की ओट में से
चाँद झाँकता नवल
पंक के सुमन में ही
सरस्वती विराजती
श्वेत कमल पुष्प को
ही शारदे निहारती
पूजता रहूँगा मैं
सदा-सदा चरण-कमल
बादलों की ओट में से
चाँद झाँकता नवल
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.
किन्तु है अमल-धवल
बादलों की ओट में से
चाँद झाँकता नवल
डण्ठलों के साथ-साथ
तैरते हैं पात-पात
रश्मियाँ सँवारतीं
प्रसून का सुवर्ण-गात
देखकर अनूप-रूप को
गया हृदय मचल
बादलों की ओट में से
चाँद झाँकता नवल
पंक के सुमन में ही
सरस्वती विराजती
श्वेत कमल पुष्प को
ही शारदे निहारती
पूजता रहूँगा मैं
सदा-सदा चरण-कमल
बादलों की ओट में से
चाँद झाँकता नवल
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.
शनिवार, 22 अक्टूबर 2011
अब बसन्त आया है : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" 07
अब बसन्त आया है : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
कुहासे की चादर,
धरा से छँट गई।
फैली हुई धवल रुई,
गगन से हट गई।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
सूर्य की
रश्मियों से,
दिवस प्रकाशित हैं।
वासन्ती सुमनों से ,
तन-मन सुवासित हैं।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
होली का उल्लास है,
आँगन-चौराहों पर।
चहल-पहल नाचती है,
पगदण्डी-राहों पर।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
गुनगुनी धूप ने,
मोर्चे सम्भाले हैं।
पर्वत भी छोड़ रहे,
बर्फ के दुशाले हैं।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
खटीमा, ऊधमसिंहनगर (उत्तराखंड)
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
कुहासे की चादर,
धरा से छँट गई।
फैली हुई धवल रुई,
गगन से हट गई।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
सूर्य की
रश्मियों से,
दिवस प्रकाशित हैं।
वासन्ती सुमनों से ,
तन-मन सुवासित हैं।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
होली का उल्लास है,
आँगन-चौराहों पर।
चहल-पहल नाचती है,
पगदण्डी-राहों पर।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
गुनगुनी धूप ने,
मोर्चे सम्भाले हैं।
पर्वत भी छोड़ रहे,
बर्फ के दुशाले हैं।
उपवन मुस्काया है!
अब बसन्त आया है!
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
खटीमा, ऊधमसिंहनगर (उत्तराखंड)
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