इस नगर से
आ गए हम तंग।
भीड़ का
पीकर ज़हर हँसते रहो
रोज़ उजड़ो
और फिर बसते रहो
किस तरह के
ये नियम, ये ढंग
इस नगर से
आ गए हम तंग।
थी बहुत
अपनी नदी मीठा कुआँ
खो गए सब
बच रहा काला धुआँ
लग गई है
ज़िंदगी में जंग
इस नगर से
आ गए हम तंग।
-डॉ. हरीश निगम
(सतना)
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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
रविवार, 23 अक्टूबर 2011
महका-महका- 11
मेहंदी-सुर्खी
काजल लिखना
महका-महका
आँचल लिखना!
धूप-धूप
रिश्तों के
जंगल
ख़त्म नहीं
होते हैं
मरुथल
जलते मन पर
बादल लिखना!
इंतज़ार के
बिखरे
काँटे
काँटे नहीं
कटे
सन्नाटे
वंशी लिखना
मादल लिखना!
--
डॉ. हरीश निगम
काजल लिखना
महका-महका
आँचल लिखना!
धूप-धूप
रिश्तों के
जंगल
ख़त्म नहीं
होते हैं
मरुथल
जलते मन पर
बादल लिखना!
इंतज़ार के
बिखरे
काँटे
काँटे नहीं
कटे
सन्नाटे
वंशी लिखना
मादल लिखना!
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डॉ. हरीश निगम
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