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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

16

मुझे दोष देने से पहले
दर्पन तो देखो
तन गुलाब का मन पलाश का
मुझे बुलाता है।

दीवाली में टेसू राजा
घर घर जाते हैं
बुझे हुये मावसी घरों में
दीप जलाते हैं

मुझे दोष देने से पहले
मौसम तो देखो
पुरवा का तन पावस का मन
क्या समझाता है।

रंगों में फूलों की मस्ती
घुल कर छाती है
आँचल से बिछुरी अँगिया
दरबार सजाती है

मुझे दोष देने से पहले
पाहुन तो देखो
मन का भृंगी गीत तरंगी
किसे सताता है

मुझे लग रहा जग सारा
यह बन पलाश का है
बिना छुये जो डस जाये
वह तन वताश का है

मुझे दोष देने से पहले
अपने को देखो
वीणा सा तन सरगम सा मन
गीत सुनाता है

- डा० जीवन शुक्ल

पलाश-गीत 16

ढाक के तीन पात थे
वो भी अब खो गये
पसई के चाउर से
सपने हम बो गये ।

जंगल का बिरवा था
बस्ती ने खा लिया
आग को पानी की
मस्ती ने पा लिया
उजड़े वीराने तो
शहरों के वंश बढ़े
पेड़ों में नव पलाश
जागे थे, सो गये ।


निर्धन की आँखों में
टेसू सा सपना है
दहक रहे सूरज से
उपवन का दहना है
डालों पर अंगारे
आँखों में सूरज है
जेठ के अंधड़ में
सपने सब खो गये ।

लाल से अधरों पर
पीली सी वंशी है
ढाक की गोद में
किरनों का अंशी है
गाँव के बाहर भी
सावन जी लेता है ।
फूलों के पाहुन भी
फागुन से हो गये ।

--डा० जीवन शुक्ल