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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

फूल टेसू के खिले हैं 16

फूल टेसू के खिले हैं

जोहती थी बाट जो
वो राह अब डसने लगी है
हाय! मेरी ढींठ अंगिया
मुझे ही कसने लगी है
राह हो, अंगिया हो,
लगता है, सभी के मन मिले हैं
समर्पण कैसे नहीं हो
फूल टेसू के खिले हैं


आम बौराये हुए
मदमत्त महुआ झूमता है
बांह फैलाए हुए
पगलाया भौंरा घूमता है
बने दुल्हन फूल,
मन के मीत कलियों को मिले हैं
नेह का पाकर निमंत्रण
फूल टेसू के खिले हैं


मैं बसन्ती आग में जल रही हूँ
प्रियतम! कहाँ हो
चिढाती अमराइयां,
कैसे हो? कुछ सोचो, जहाँ हो
मैं अकेली रुआंसी,
कलियों पे भौंरे दिलजले हैं
नियंत्रण कैसे रहेगा
फूल टेसू के खिले हैं


देख आ,
कोई तुम्हारी याद में यूँ गल रही है
छाँव भी अठखेलियाँ
अब धूप के संग कर रही है
तन तुम्हारा, मन तुम्हारा
स्वप्न में तो हम मिले हैं
मन नहीं लगता है प्रियतम
फूल टेसू के खिले हैं


चाह मन की मन में ही कब तक रखूँ मैं
ये बता दो
धैर्य रख लूंगी
अगर तुम चाह अपनी भी जता दो
जीत लो जब मन करे
तुझ पर निछावर सब किले हैं
आग मन मेंरे,
दहकते फूल टेसू के खिले हैं

-शेषधर तिवारी

बस इतना सा समाचार है 15

बस इतना सा समाचार है

घूरे पर बैठा बच्चा
खाने को कुछ भी बीन रहा है
लगता है बिधना से लड़कर
अपना जीवन छीन रहा है
क्या इसको भी जीना कहते
आता मन में यह विचार है
बस इतना सा समाचार है

अपने बालों के झुरमुट से
जाने क्या वो खींच रही है
बूढ़ी दादी गिने झुर्रियाँ
गले मसूढे भींच रही है
जीने की इच्छा तो मृत है
मरने तक ज़िंदगी भार है
बस इतना सा समाचार है

बिटिया की शादी सर पर है
कैसे बेड़ा पार लगेगा
कुछ दहेज़ तो देना होगा
वरना सब बेकार लगेगा
रिश्तेदार कसेंगे ताने
अपनी बिटिया बनी भार है
बस इतना सा समाचार है

अब की बार फसल अच्छी हो
तो कुछ घर में काम कराऊँ
टपक रही झोपडी इसे भी
नए प्लास्टिक से ढंकवाऊँ
कई दिनों से खांस रहा हूँ
छोटी बिटिया को बुखार है
बस इतना सा समाचार है

शेषधर तिवारी
(इलाहाबाद)