धुंध है अंधेरा है
नभ से उतर कोहरे ने
धरा को घेरा है
दुबके पाँखी
गइया गुम-सुम
फूलों से भौंरे
तितली गुम
मौसम ने मौन राग छेड़ा है
मजूर ठिठुर कर
अलाव ताप रहे
पशु पंछी पौधे
थर-थर काँप रहे
धुंधला सा आज सवेरा है
रेल रुकी
उड़ते अब विमान नहीं
फ़सलें सहमी
खेतों मे दिखते किसान नहीं
कोहरा लगा रहा फेरे पर फेरा है
सूरज की
किरन हुईं गाइब
चंदा घर जा
बैठा है साहिब
सब जगह कोहरे का डेरा है
--श्याम सखा ‘श्याम’
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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
शनिवार, 22 अक्टूबर 2011
घर लौट आओ : श्याम सखा श्याम 07
घर लौट आओ : श्याम सखा श्याम
आई बसन्त
जाड़ा उड़न्त
घर लौट आओ
प्रिय कन्त
लो जाड़े का
हठ टूटा
तन से ऊनी
केंचुल छूटा
बसन्त है ऋतुराज सुमन्त
कलियों की
फ़ूटी मुस्कान
तितली
मांग रही लगान
भौंरे भी आ गये तुरन्त
पगलाई फिर रही
बयार
ठूंठों पर
मचली बहार
बहके-महके से दिग-दिगन्त
--
श्याम सखा श्याम
आई बसन्त
जाड़ा उड़न्त
घर लौट आओ
प्रिय कन्त
लो जाड़े का
हठ टूटा
तन से ऊनी
केंचुल छूटा
बसन्त है ऋतुराज सुमन्त
कलियों की
फ़ूटी मुस्कान
तितली
मांग रही लगान
भौंरे भी आ गये तुरन्त
पगलाई फिर रही
बयार
ठूंठों पर
मचली बहार
बहके-महके से दिग-दिगन्त
--
श्याम सखा श्याम
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