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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

सौ सौ बार बधाई 06

चढ़ती धूप उतरता कुहरा
नव कोंपल अँखुआई
नए वर्ष में
नवगीतों की फिर बगिया लहराई

मन कुरंग
भर रहा कुलाँचें
बहकी गंध-भरी पुरवाई
ठिठुरन बढ़ी
दिशाएँ बाधित
चन्द्र-ग्रहण ने की अगुआई
फिर से आज बधाई!
सबको सौ-सौ बार बधाई!!

सारस जोड़ी
लगीं उतरने
होने लगीं कुलेलें
विगत साल की
उलझी गुत्थीं चोंच मिलाकर खोलें
मंत्र-मुग्ध हो गई किसानिन
सकुची, खड़ी, लजाई !
फिर से आज बधाई!
सबको सौ-सौ बार बधाई !!


-डा० व्योम

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

17

भीड़ भरी इस
नीरवता का
किससे करें गिला

पीपल, बरगद, नीम
छोड़कर कहाँ चले आये
कैसे कहें
यहाँ पग-पग पर
ज़ख्म बहुत खाये
जो आया
हो गया यहीं का
वापस जा न सका
चुग्गे की
जुगाड़ में पंछी
खुलकर गा न सका
साँसों वाली
मिली मशीने
इंसां नहीं मिला

इस मेले में
सभी अकेले
कैसा ये संयोग
जितना ऊँचा
कद दिखता है
उतने छोटे लोग
किसको फुरसत यहाँ
कि जाने, उसका कौन पड़ोसी
मन में ज्वार
छिपा रहता है
होठों पर खामोशी
रहे बदलते
राजा रानी
बदला नहीं किला

अपनी अपनी
नाव खे रहे
सब नाविक ठहरे
कोई नहीं
किसी की सुनता
सबके सब बहरे
बूढ़े बरगद की
दाढ़ी का
कहाँ ठिकाना है
गौरैया का
नहीं यहाँ अब
आना जाना है
गमलों में भी
कहीं भला कब,
कोई कमल खिला

-डा० जगदीश व्योम
(नई दिल्ली)

हम पलाश के वन 16

ये कैसी आपाधापी है
ये कैसा क्रंदन
दूर खड़े चुप रहे देखते
हम पलाश के वन

तीन पात से बढ़े न आगे
कितने युग बीते
अभिशापित हैं जनम-जनम से
हाथ रहे रीते
सहते रहे ताप, वर्षा
पर नहीं किया क्रंदन
हम पलाश के वन

जो आया उसने धमकाया
हम शोषित ठहरे
राजमहल के द्वार, कंगूरे
सब निकले बहरे
करती रहीं पीढ़ियाँ फिर भी
झुक-झुक अभिनंदन
हम पलाश के वन

धारा के प्रतिकूल चले हम
जिद्दीपन पाया
ऋतु वसंत में नहीं
ताप में पुलक उठी काया
चमक दमक से दूर
हमारी बस्ती है निर्जन
हम पलाश के वन

-डा० जगदीश व्योम

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

कान में कहकर गया-डा० जगदीश व्योम 09

उड़ गया मधुपान कर
कोई मधुप
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई
सुर्ख चेहरे हो गए
जलकुंभियों के
कान में कहकर गया
कुछ बात कोई

डाकियों के का़फिले
फिर चल पड़े हैं
गंध-भीनी चिट्ठियाँ
लेकर परों में
गाँव के रिश्ते
सरोवर से जुड़े हैं
लग गई फिर पहुँचने
पुरइन घरों में
हो गया ऐसा असर
फिर जादुई है
कुछ दिनों से
सो न पाई रात कोई
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई

बढ़ गई चिन्ता
सरोवर में बढ़ा जल
गात पुरइन ने बढ़ाया
जल सतह तक
घट गया जल
पर न घट सकता कमल-कद
अन्त तक जूझा हवा से
फिर फतह तक
है हमारे संस्कारों का पुरोधा
या सुरभि के सिन्धु का
नवजात कोई
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई

डा० जगदीश व्योम

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

सो गई है मनुजता की संवेदना : जगदीश व्योम 08

सो गई है मनुजता की संवेदना
गीत के रूप में भैरवी गाइए
गा न पाओ अगर जागरण के लिए
कारवां छोड़कर अपने घर जाइए

झूठ की चाशनी में पगी ज़िंदगी
आजकल स्वाद में कुछ खटाने लगी
सत्य सुनने की आदी नहीं है हवा
कह दिया इसलिए लड़खड़ाने लगी
सत्य ऐसा कहो‚ जो न हो निर्वसन
उसको शब्दों का परिधान पहनाइए।

काव्य की कुलवधू हाशिए पर खड़ी
ओढ़कर त्रासदी का मलिन आवरण
चन्द सिक्कों में बिकती रही ज़िंदगी
और नीलाम होते रहे आचरण
लेखनी छुप के आंसू बहाती रही
उनको रखने को गंगाजली चाहिए।

राजमहलों की कालीनों में खो गया
कितनी रंभाओं का वह कुंआरा रुदन
देह की हाट में भूख की त्रासदी
और भी कुछ है तो उम्र भर की घुटन
इस घुटन को उपेक्षा बहुत मिल चुकी
अब तो जीने का अधिकार दिलवाइए।

भूख के प्रश्न हल कर रहा जो उसे
है जरूरत नहीं कोई कुछ ज्ञान दे
कर्म से हो विमुख व्यक्ति गीता रटे
और चाहे कि युग उसको सम्मान दे
ऐसे भूले पथिक को पतित पंक से
खींच कर कर्म के पंथ पर लाइए।

कोई भी तो नहीं दूध का है धुला है
प्रदूषित समूचा ही पर्यावरण
कोई नंगा खड़ा वक्त की हाट में
कोई ओढ़े हुए झूठ का आवरण
सभ्यता के नगर का है दस्तूर ये
इनमें ढल जाइए या चले आइए।
--
डॉ. जगदीश व्योम