मेघ आए
हम चलें भीगें कि
अपना घर बचाएँ
नींव है कमजोर
डर है ढह न जाए
प्यास से जब कंठ सूखे
गाँव के, बरसे न ये घट
आदमी जैसे भरोसा
खो चुके हैं नीर के नट
हो गए हैं अर्थ
ऋतुओं के निरर्थक
जिंदगी के गीत रूठे
किस तरह गाएँ
आ गया दालान तक
पानी गली को पारकर
एक चादर थी, हुई गीली
न सोया हारकर
बिस्तरे, बर्तन हुए हैं
नाव, आँगन ताल
डूबकर इसमें जिएँ
या डूब जाएँ
दर्द के झूले, अभावों ने
रची कजरी हमारी
जेठ सावन पर हमेशा
ही पड़ी है भूख भारी
जागना जिनको वही
सोए हुए हैं तानकर
मेह बरसे आग
शायद जाग जाएँ
बहुत गहरे एक बादल
गरजता मेरे हृदय में
उठ रहा तूफान बनकर
हौसले जैसा प्रलय में
बाढ़ दुख की बह चली तो
रोक पाएगा न कोई
और कब तक हम सहें
वे जुल्म ढाएँ
--
डॉ. सुभाष राय
ए-१५८, एम आई जी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा (उ.प्र.)
फ़ोन-०९९२७५००५४१
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रविवार, 23 अक्टूबर 2011
आ गया दालान तक पानी : डॉ.सुभाष राय 10
कमल से सीखें सबक 09
सीख लें हम सब कमल से
यह सबक छूटे न हमसे
पंक में रहकर न उसमें लिप्त होना
हलचलों के बीच स्थिर चित्त होना
पात पर उसके न रुकता जल कभी
और गीला कर न पाता पंक भी
कुछ न कुछ संदेश इसमें
कह रहा वह रोज सबसे
यह सबक छूटे न हमसे
कीच, दलदल में उलझता आदमी
क्यों कमल जैसा न बनता आदमी
रास्ता सच का न मिलता है कभी
या कि सच से दूर रहता आदमी
झूठ, धोखा, छल बहुत है
सत्य का संधान कबसे
यह सबक छूटे न हमसे
रश्मियों की थाप पर तन डोलता
सूर्य उगता तो कमल मुख खोलता
देखते हैं पर न हम कुछ सीखते
यह उजाला ज्ञान बनकर बोलता
तमस में ही खुश रहे हम
होश आया हाय जबसे
यह सबक छूटे न हमसे
गल्प में, मिथ में कमल के गान हैं
जलज के माने सुबह का भान है
नाभि से जगदीश के उगता कमल
और ब्रह्मा का वही सुस्थान है
लक्ष्मी हैं पद्मनाभप्रिया सुनो
मुक्ति देतीं गहन तम से
यह सबक छूटे न हमसे
--
डॉ. सुभाष राय
ए-१५८, एम आई जी,
शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा (उ.प्र.)
यह सबक छूटे न हमसे
पंक में रहकर न उसमें लिप्त होना
हलचलों के बीच स्थिर चित्त होना
पात पर उसके न रुकता जल कभी
और गीला कर न पाता पंक भी
कुछ न कुछ संदेश इसमें
कह रहा वह रोज सबसे
यह सबक छूटे न हमसे
कीच, दलदल में उलझता आदमी
क्यों कमल जैसा न बनता आदमी
रास्ता सच का न मिलता है कभी
या कि सच से दूर रहता आदमी
झूठ, धोखा, छल बहुत है
सत्य का संधान कबसे
यह सबक छूटे न हमसे
रश्मियों की थाप पर तन डोलता
सूर्य उगता तो कमल मुख खोलता
देखते हैं पर न हम कुछ सीखते
यह उजाला ज्ञान बनकर बोलता
तमस में ही खुश रहे हम
होश आया हाय जबसे
यह सबक छूटे न हमसे
गल्प में, मिथ में कमल के गान हैं
जलज के माने सुबह का भान है
नाभि से जगदीश के उगता कमल
और ब्रह्मा का वही सुस्थान है
लक्ष्मी हैं पद्मनाभप्रिया सुनो
मुक्ति देतीं गहन तम से
यह सबक छूटे न हमसे
--
डॉ. सुभाष राय
ए-१५८, एम आई जी,
शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा (उ.प्र.)
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