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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

मौसम ने 06

मौसम ने
एक बार किया फिर खुलासा
कौन करे दूर मेरे मन का कुहासा

झेला जो मैंने वो झेले न कोई
जाड़ों की रातें हैं छम छम के रोईं
नहीं अफ़साना है कोई ये
सुना सा

बर्फ़ीली सर्दी ये सबको बताती
उल्फ़त की गर्मी है रिश्ते जमाती
कंपकंपी सी छूटे है मिले जो
नया सा

कपड़ों पे कपड़े तन पे रहते चढ़े
ठंडी नज़र उनकी सीधी मन में गड़े
शीत लहर को भी चढ़ा है
नशा सा

बाहर की ठंडक औ अंदर की ठिठुरन
आहों की सरगम औ सीने की जकड़न
कैसा है कम्पन नहीं चैन
ज़रा सा


पागल सा मन है ढूँढे उसी को
तड़पाया जिसने रह-रह इसी को
बर्फ़ में दबे हम न दोस्त न
दिलासा

निर्मल सिद्धू

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

आँगन में उतरे जो साए 08

आँगन में उतरे जो साए,
विस्फोटों से दिल दहलाए।
तड़-तड़ करके ऐसे चीखे,
घरवालों को मौत सुलाए।

पाँव बड़े
आतंक के देखे,
रह गए सारे
हक्के-बक्के।
ख़ून-ख़राबा, गोला-बारी
गलियाँ सूनी मरघट चहके।
पौरुषता को कभी न भाये।

धर्म-जुर्म का
गहरा नाता,
सहमी बहना
सहमा भ्राता।
आचार संहिता दम तोड़े तो
दुर्बल कोई न्याय न पाता,
सबको दहशत से धमकाए।

अजगर भय का
जग को लीले,
कृष्ण ही आकर
इसको कीलें।
एक नहीं कई शिव चाहिए
जो उग्रवाद के ज़हर को पीलें,
रक्त विषैला कहाँ से लाए?
--
निर्मल सिद्धू

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

फागुन आयो रे : निर्मल सिद्धू 07

फागुन आयो रे : निर्मल सिद्धू

दिल-दिल में
उल्लास बड़ा
उत्पात
मचायो रे,
फागुन आयो रे!

किरनों ने अब
धुंध को चीरा
मन्द-मन्द है
बहे समीरा,
बगिया में
भंवरा भी फिर से
घात लगायो रे!
फागुन आयो रे!

ऋतुओं की रानी
है फागुन
एक नहीं
बहुतेरे हैं गुन,
मिलजुल सारे
प्रेम की इक
अलख जगायो रे!
फागुन आयो रे!

दिवस बड़े और
रैना छोटी
चुहल करे
नयनों की गोटी,
सजन-सजनिया
होली में मिल
रंग जमायो रे!
फागुन आयो रे!

उलझा जग का
तानाबाना
कभी कोई
कभी कोई निशाना,
उजड़े लोगों में
दोबारा
आस जगायो रे!
फागुन आयो रे!
--
निर्मल सिद्धू